हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
वर्तमान समस्याएँ एकदूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ संबंध है। चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव; बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुलझा लिया जाए और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है, तो उनके हल निकलकर ही रहेंगे।
शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्रबल-धनबल। दूसरा बुद्धिबल-संगठनबल। पिछले बहुत समय से शस्त्रबल और धनबल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन में आया सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवीशक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठनबल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ कर दिखा सकती है, इसकी अनुभूति सबको करानी है।
न्याय की प्रतिष्ठा हो; नीति को सब ओर से मान्यता मिले; सब लोग हिल-मिलकर रहें और मिल-बाँटकर खाएँ, इस सिद्धांत को जनभावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जाएगा, तो दिशा मिलेगी; उपाय सूझेंगे; नई योजनाएँ बनेंगी; प्रयास चलेंगे और अंततः लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय बन ही जाएगा।
‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, यह दो ही सिद्धांत ऐसे हैं, जिन्हें अपना लिए जाने के उपरांत तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किन अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा; किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा? मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके।
अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अंत समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रमपूर्वक किया भी जाएगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकता से प्रतीक्षा कर सकते हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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