रामकृष्ण परमहंस की चमत्कारी घटना |
विवेकानंद जब उनके पास गए रामकृष्ण परमहंस के और यह कहने लगे, "पिताजी, हमारी नौकरी लगवा दीजिए हम, हमारे भाई बहन भूखे मरते हैं।" उन्होंने कहा, "जा बेटा, उस काली के पास चला जा।" काली के पास जब विवेकानंद गए, तो उन्होंने इतना विशाल काली को देखा और जमीन से लेकर के आसमान तक जीभ लप-लपाती हुई काली, आग की तरीके से जलती हुई काली, हुँकारती हुई काली और फुसकारती हुई काली को देखा, भयंकर काली को देखा। विवेकानंद कांप गए। उन्होंने कहा, "मां, मैं तो नौकरी मांगने नहीं आया।" काली ने पूछा, "फिर क्या मांगने आया है?" "मां, मैं शक्ति मांगने आया, भक्ति मांगने आया और मैं शांति मांगने आया।" काली हंसी और उससे कहा, "जा, तुझे शक्ति भी दे दी, भक्ति भी दे दी और तुझे शांति भी दे दी। तीनों चीज़ दे दी, चली जा।" और बस वह काली जो थी, पत्थर में से निकली थी और पत्थर में फिर समा गई। एक बार काली का एक और चमत्कार है, जिस रानी ने दक्षिणेश्वर का मंदिर बनाया था, उसका नाम था रासमणि। रासमणि ने रामकृष्ण परमहंस को पुजारी रखा था, नौकर रखा था और पुजारी रोजाना शिकायत की रासमणि से, "आपका पुजारी तो यह करता है कि जो सारी थाली आप खुद ही खा जाता है, देवी को तो जूठन दिखाता है और यह बड़ा खराब पुजारी है।" रानी रासमणि ने कहा, "ऐसा तो नहीं हो सकता, पर मैं देखूं तो सही बात क्या है?" उन्होंने झरोखे में जो मंदिर के ऊपर लगा हुआ था, चुपके से आंखें लगा करके बैठ गई और उन्होंने यह देखा, रामकृष्ण परमहंस क्या करता है?" क्या करता है रामकृष्ण परमहंस? थाली लेकर के आए, उन्होंने कहा, "मां भोजन करो, वह तो पत्थर का खिलौना था, क्या भोजन करता?" चुपचाप बैठा रहा, अच्छा, "मां, पहले हम खा लेंगे, बेटा खा लेगा, तब मां खाएगी।" आधी रोटी उसने आधा आधा सब खा लिया, "अब मां, तुमको खाना पड़ेगा।" थाली साफ हो गई। रामकृष्ण परमहंस खाली थाली को लेकर के आए और थाली को साफ करने के लिए जा रहे थे। रासमणि ने जो दृश्य अपनी आंखों से देखा, उनके चरण पकड़ लिए और उन्होंने कहा, "देव, आप ही साक्षात काली हैं, काली और कोई नहीं है, आप काली हैं, आप काली हैं।" वह काली जो इतना चमत्कार दिखाती थी, रामकृष्ण परमहंस की काली, जिसने विवेकानंद को विवेकानंद बना दिया, सिद्धियों के देवता कहलाते थे रासमणि, जिस काली की वजह से काली का चमत्कार था। हां बेटे, काली का चमत्कार था। वह काली कौन सी थी? वह काली जी, रामकृष्ण परमहंस ने अपने भीतर से पैदा की थी। अब काली जिंदा है? अब तो बेटे वह मर गई। कब मरी? जिस दिन रामकृष्ण परमहंस मरे, उन्हीं के साथ में जल करके दफन हो गई, खाक हो गई। अब जिंदा है? अब तो पत्थर का खिलौना अभी भी पड़ा हुआ है, उसकी जीभ को चोर चुरा ले गए। काली की जो सोने की जीभ थी, ईसाई पुलिस सुपरिटेंडेंट आया, उसने कहा, "कि आपकी काली वेजिटेरियन थी या नान वेजिटेरियन?" हंसी में पूछा, ईसाई था। वह, "हमारी काली तो नान वेजिटेरियन थी।" जब चोर उसके मुंह में से हाथ डाल के जीभ उखाड़ रहा था, तब उसने काटा क्यों नहीं? काली क्या कर सकती थी? काट नहीं सकती थी। पत्थर का टुकड़ा क्या काटेगा? पत्थर के टुकड़े नहीं काट सकते। फिर, फिर क्या हो सकता है? बेटे, वह काली कौन सी थी? काली वही थी जो रामकृष्ण परमहंस की श्रद्धा और विश्वास में से पैदा हुई थी, विश्वास में से पैदा हुई थी। गुरु भी पैदा हो सकता है, हां बेटे, गुरु भी पैदा हो सकता है।
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