दीपक जलाने का उद्देश्य क्या है?
हम सबेरे भी आपको ध्यान कराते हैं, छोटे-छोटे पीसों में कराते हैं, अलग-अलग तरह की वेरायटीज में कराते हैं, ताकि आपको एक ही विचार के ऊपर, एक क्रियापद्धति के ऊपर ध्यान को लगाना सीखने का मौका मिले। आपको यही करना चाहिए, आपको यही करना चाहिए। उपासना का जब समय आए, तो आपको अपनी उपासना के समय पर, जो क्रिया-कृत्य करते हैं, उसके पीछे जो शिक्षण दिए गए हैं, शिक्षण करने के साथ में अपने आपको मिलाइए। जब आप देवता के सामने फूल चढ़ाते हैं, तो इस चक्कर में पड़िए मत कि साहब, ये चमेली का फूल है, गुलाब का फूल है, गेंदा का फूल है, या बेला का फूल है। महादेव जी आक का फूल खाते हैं, गणेश जी उसका चमेली का फूल खाते हैं, और विष्णु भगवान जी गुलाब का। ये बेकार की बातें छोड़ दो, ये छोड़ दो। तो आदमी का जीवन फूल जैसा होना चाहिए। यदि फूल जैसा जीवन कोमल होगा, तो भगवान के चरणों में भी हमको स्थान मिल सकता है, गले में भी स्थान मिल सकता है, शरीर में भी स्थान मिल सकता है, हर जगह स्थान मिल सकता है। शर्त यह है कि हम फूल जैसा जीवन के हों। हँसता हुआ जीवन, कोमल जैसा जीवन, मुलायम जैसा जीवन, सुगंधित जैसा जीवन बनाने की कोशिश करें। इन विचारों को जब फूल चढ़ाया करें, यही विचार किया करें, हमारा फूल जैसा जीवन बनाएं। फूल जैसा जीवन बनना चाहिए, फूल जैसे जीवन का हमारा उद्देश्य होना चाहिए। फूल चढ़ाता रहे, यह विचार करता रहे, इस फूल की गुलदस्ता बनाऊं, की माला बनाऊं, यह करूं, यह करूं। बेकार की बातें, बेकार की बातों में समय खराब करता रहता है। यह नहीं सोचता है कि हमें अपना जीवन फूल जैसा बनाना है। दीपक जब हम चढ़ते हैं, दीपक के समय पर हमारा विचार होना चाहिए। भगवान को दीपक दिखाने की जरूरत नहीं है। भगवान के पास जो-जो ज्योति जलते रहते हैं, दिन भर तो सूरज जलता रहता है, रात भर को चंद्रमा जलता रहता है। आप भगवान को नहीं देंगे, जलाएंगे, तो भगवान का कोई हर्ज नहीं हो सकता। दीपक जलाना तो, "महाराज जी, क्यों पैसा खर्च करें, हम क्यों जलाएं बार-बार?" बेटे, उसका एक कारण है। एक ऐसा आदमी है, बेवकूफ, आँखों से अंधा, उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ता। उसके सामने दीपक जलाकर दिखा दे, तो उसको रास्ता तो दिखाई पड़े। कौन है वह बेवकूफ और अंधा आदमी? वह है तू और हम, हम हैं जिनको कुबुद्धि कह सकते हैं। हमको पता ही नहीं है, कुछ, कुछ दिखता ही नहीं है। न अपना मरना दिखता है, न जीना दिखता है। एक ही चीज दिखती है, विलासिता। एक ही चीज दिखती है, तृष्णा। एक ही चीज दिखती है, वासना। एक ही चीज दिखता है, लोभ, और कुछ नहीं दिखता। हम हैं अंधे, हम हैं आँखों से खराब, हमको मोतियाबिंद की शिकायत है। इसीलिए अंधेरे में भटकने वालों को रोशनी की जरूरत है। इसलिए हम दीपक जलाते हैं, भगवान के सामने। भगवान के सामने, हां बेटे, भगवान के बहाने, अपने आपके सामने दीपक जलते हैं। हमारी जिंदगी का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जैसे कि इस दीपक का है, रोशनी। रोशनी से जीवन, रोशनी कैसी, जैसी बिजली की लगती है? अरे, तो महाराज जी, बिजली की बत्ती तो मैं रोज जलाता रहता हूँ। नहीं, बेटे, उससे मतलब नहीं है। रोशनी से मतलब, तमसो मा ज्योतिर्गमय। हमको अंधकार की ओर से लेकर के प्रकाश की ओर लेकर चलिए। इसका मतलब यह नहीं है कि टॉर्च आगे-आगे जलाते चलिए, और आप तो आगे, हमको अंधेरे में से ले चलिए। यह मतलब नहीं है, चमक की रोशनी से। मतलब नहीं है रोशनी से। रोशनी से मतलब होता है ज्ञान। दीपक जो हम जलाते हैं, इसका मतलब यह है कि हमारा मस्तिष्क ज्ञान से भरा हुआ हो, विचारणाओं से भरा हुआ हो, प्रज्ञा से भरा हुआ हो।
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