चरित्र निर्माण का महत्व | Chraitra Nirman Ka Mehtav
युग निर्माण का आंदोलन भावनात्मक नवनिर्माण है। भावना की पूंजी दुनिया में सबसे बड़ी पूंजी है। भावना की शक्ति दुनिया में सबसे बड़ी शक्ति है। और भावनाओं की शक्तियों की पूंजी को आगे बढ़ाने के लिए हमको वो आदमी की आवश्यकता है, जिनके पास वह संपदा स्वयं हो। जले हुए दीपक ही तो दूसरों को जला सकते हैं। जो दीपक स्वयं बुझे हुए हैं, वह किस तरीके से दूसरों को जलाएंगे? साफ पानी से ही तो कीचड़ धोई जा सकती है। अगर साफ पानी न हो, और हमारे पास मैला-कुचैला पानी हो, कीचड़ हो, तो कीचड़ से कीचड़ कौन धोए? अंधा अंधे को रास्ता कैसे दिखाएगा?
हम लोगों को आशावान होना चाहिए, स्वच्छ होना चाहिए, प्रकाशवान होना चाहिए, भावना संपन्न होना चाहिए, चरित्रवान होना चाहिए, उच्च दृष्टिकोण का होना चाहिए। यह काम जब तक हम नहीं करेंगे, तब तक हमारी आवश्यकताएं पूरी न हो सकेंगी। आंदोलन रोज खड़े होते हैं, रोज समाप्त हो जाते हैं। आंदोलन, यज्ञ रोज होते हैं, रोज बंद हो सकते हैं। लेकिन वह बात जो कभी बंद नहीं हो सकती, वह यह है कि मनुष्य के भीतर से उसकी आंतरिक निष्ठा की सुगंधि।
यदि पहले तो हम चंदन के पेड़ की तरह जहां कहीं भी रहें, वही-वही सुगंधि के वृक्ष पैदा करते रहें। दीपक की तरह अगर हम प्रकाशवान हों, तो हमारे आसपास स्वयं प्रकाश पैदा होता रहे। सबसे बड़ा काम युग निर्माण का जो करना है, वह हमारा आत्म निर्माण है, व्यक्ति निर्माण है। हम श्रेष्ठ बनेंगे, पवित्र बनेंगे, चरित्रवान बनेंगे, भावना संपन्न बनेंगे, उदात्त बनेंगे — उतने ही हमारे क्रियाकलापों में तेजी आएगी।
संभव है, इस तरह का उच्च चरित्र, प्रवृत्ति कोई बहुत बड़ा आंदोलन न कर सके। संभव है, कोई बहुत बड़े आयोजन न कर सके। संभव है, कोई बहुत बड़े दिखाई पड़ने वाले काम आपके द्वारा संपन्न न हों। लेकिन इतना होते हुए भी जो काम कर सकता है, वह यह कर सकता है कि अपने चरित्र को ऐसा बना ले जैसे कि दीपक। अपने चरित्र को ऐसा बना ले जैसे कि चंदन का पेड़।
चंदन का पेड़ कहीं जाता है क्या? चंदन का पेड़ कहीं कुछ करता है क्या? लेकिन असंख्य सांप और बिच्छू उसके पास आते हैं, अपना ज़हर खो-खो देते हैं और उसमें चिपक लेते हैं। चंदन किसी को उपदेश देने जाता है क्या? लेकिन असंख्य झाड़ियां उसकी जैसे सुगंधित बन जाती हैं। दीपक कहां-कहां फिरता रहता है? कहीं फिरता नहीं है, लेकिन इतना होते हुए भी वह अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशवान बना देता है।
यह हमारी मूलभूत आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमको रचनात्मक कार्यों में योगदान नहीं देना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमको झोला पुस्तकालय चलाने से उपेक्षा करनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि ज्ञान यज्ञ के प्रति हमारी निष्ठा न हो। हमको चरित्रवान बनना चाहिए और अपनी भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाना चाहिए। अपनी भावना को उच्चस्तरीय रख करके, अपने आप को चरित्रवान बना करके, फिर हम थोड़ा भी काम करेंगे तो उसका बहुत फल होगा।
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