त्रिपदा गायत्री का रहस्य | Gayatri Tripda Ka Rehsay
आप बताइए, अंतरंग को हम नहीं बता सकते और न आप जान सकते हैं। जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", तुझे दिव्य चक्षु देते हैं। देखने के लिए दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं कि हम एक पंडित हैं, एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं।
हमारे वरदान और आशीर्वाद से आदमियों का भला हो जाता है। आदमी के बाल-बच्चे हो जाते हैं, बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है। यह सब हो जाता है।
"महाराज जी, इतना क्या बता रहे हैं?"
बेटे, विज्ञान बता रहे हैं। और क्या बताएँ? यह बेटा, विज्ञान है। यह हमारे विज्ञान का परिणाम है, और हमारे ज्ञान का।
ज्ञान का हम नहीं बता सकते। ज्ञान को हम कैसे बताएँ तुझे?
"आपके गुरुजी कैसे हैं?"
600 वर्ष के हो गए हैं।
"कितने लंबे हैं?" — इतने लंबे हैं।
"दाढ़ी कितनी बड़ी है?" — इतनी बड़ी है।
"और बताइए?" — बस हो गया। और क्या बताएँ?
"नहीं महाराज जी, उनकी जीवात्मा को बताइए। जीवात्मा से सुनने की इच्छा है।"
पर उसका कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर पड़ने वाला नहीं है। प्रभाव पड़ने वाला है, किन्तु तुम यही पूछते रहते हो — "हमको कोई दिखा ले, हमको लिवा लाना, हमको दिखा लाना। आपके गुरुजी कहाँ रहते हैं, दिखा लाना।"
मूर्ख कहीं का! क्या दिखा लाना? शक्ल दिखा लाएँगे? हाँ, शक्ल दिखा लाएँगे।
भौतिक — भौतिक ही आदमी की दृष्टि है। इसलिए कल हमने भौतिक इसका स्वरूप बता दिया था। गायत्री मंत्र का भौतिक स्वरूप क्या हो सकता है, और उससे भौतिक लाभ क्या हो सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ इससे लाखों गुना, करोड़ों गुना ज्यादा हैं। जड़ जमीन में होती है, दिखाई नहीं देती, पर होती है। पेड़ जितना बड़ा होता है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है। जड़ दिखती है? नहीं, हमें नहीं दिखती।
बेटे, बरगद का वृक्ष जितना ऊपर से बड़ा होता है, ठीक उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है।
आप खुदाई करके देखिए — मोटी जड़ें, महीन जड़ें, बारीक जड़ें — सब कितनी लंबाई में फैली हुई होती हैं। ठीक उतनी ही लंबाई में, जितनी कि वह वृक्ष बाहर फैला हुआ होता है।
आदमी का भौतिक विस्तार — जिसे आप रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, वैभव या वर्चस्व कह सकते हैं — वह जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में, उसी गहराई का उसका अंतरंग भी होगा।
अंतरंग कैसा हो सकता है? यह हम तुम्हें बता रहे थे। बहिरंग समझाने के बाद अब अंतरंग। हमने पिछले दो-तीन दिनों की व्याख्याओं में बताया कि अध्यात्म का अंतरंग क्या हो सकता है।
त्रिपदा गायत्री — यह क्या हो सकती है?
त्रिपदा, यानी तीन चरण —
जो हमारे रिश्तों से संबंध रखते हैं,
जो हमारे चिंतन से,
हमारे दृष्टिकोण से,
और हमारी आस्थाओं से संबंध रखते हैं।
आप बताइए, अंतरंग को हम नहीं बता सकते और न आप जान सकते हैं। जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", तुझे दिव्य चक्षु देते हैं। देखने के लिए दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं कि हम एक पंडित हैं, एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं।
हमारे वरदान और आशीर्वाद से आदमियों का भला हो जाता है। आदमी के बाल-बच्चे हो जाते हैं, बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है। यह सब हो जाता है।
"महाराज जी, इतना क्या बता रहे हैं?"
बेटे, विज्ञान बता रहे हैं। और क्या बताएँ? यह बेटा, विज्ञान है। यह हमारे विज्ञान का परिणाम है, और हमारे ज्ञान का।
ज्ञान का हम नहीं बता सकते। ज्ञान को हम कैसे बताएँ तुझे?
"आपके गुरुजी कैसे हैं?"
600 वर्ष के हो गए हैं।
"कितने लंबे हैं?" — इतने लंबे हैं।
"दाढ़ी कितनी बड़ी है?" — इतनी बड़ी है।
"और बताइए?" — बस हो गया। और क्या बताएँ?
"नहीं महाराज जी, उनकी जीवात्मा को बताइए। जीवात्मा से सुनने की इच्छा है।"
पर उसका कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर पड़ने वाला नहीं है। प्रभाव पड़ने वाला है, किन्तु तुम यही पूछते रहते हो — "हमको कोई दिखा ले, हमको लिवा लाना, हमको दिखा लाना। आपके गुरुजी कहाँ रहते हैं, दिखा लाना।"
मूर्ख कहीं का! क्या दिखा लाना? शक्ल दिखा लाएँगे? हाँ, शक्ल दिखा लाएँगे।
भौतिक — भौतिक ही आदमी की दृष्टि है। इसलिए कल हमने भौतिक इसका स्वरूप बता दिया था। गायत्री मंत्र का भौतिक स्वरूप क्या हो सकता है, और उससे भौतिक लाभ क्या हो सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ इससे लाखों गुना, करोड़ों गुना ज्यादा हैं। जड़ जमीन में होती है, दिखाई नहीं देती, पर होती है। पेड़ जितना बड़ा होता है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है। जड़ दिखती है? नहीं, हमें नहीं दिखती।
बेटे, बरगद का वृक्ष जितना ऊपर से बड़ा होता है, ठीक उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है।
आप खुदाई करके देखिए — मोटी जड़ें, महीन जड़ें, बारीक जड़ें — सब कितनी लंबाई में फैली हुई होती हैं। ठीक उतनी ही लंबाई में, जितनी कि वह वृक्ष बाहर फैला हुआ होता है।
आदमी का भौतिक विस्तार — जिसे आप रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, वैभव या वर्चस्व कह सकते हैं — वह जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में, उसी गहराई का उसका अंतरंग भी होगा।
अंतरंग कैसा हो सकता है? यह हम तुम्हें बता रहे थे। बहिरंग समझाने के बाद अब अंतरंग। हमने पिछले दो-तीन दिनों की व्याख्याओं में बताया कि अध्यात्म का अंतरंग क्या हो सकता है।
त्रिपदा गायत्री — यह क्या हो सकती है?
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और हमारी आस्थाओं से संबंध रखते हैं।
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