गायत्री द्वारा पापों की निवृत्ति (भाग 02)
गायत्री खतरे की घंटी है, चौराहे पर खड़ी पुलिस है। वह बताती है कि पाप की ओर मत चलो। ईश्वर सर्व व्यापक है, वह किसी का पक्षपात नहीं करता, उससे तुम्हारा कोई पाप छिपा नहीं रह सकता। और तुम किसी पाप के प्रतिफल से बच नहीं सकते। ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ के अक्षर निरन्तर हमें यही शिक्षा देते हैं। रेल की पटरी के किनारे पर जो सिग्नल खड़े होते हैं, वे बताते हैं कि किधर जाना चाहिए किधर नहीं।
यदि सिग्नल का आदेश न मानकर कोई ड्राइवर अपनी रेल गाड़ी को मनमानी रीति से दौड़ा ले जाय तो परिणाम कितना भयंकर होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वह रेल किसी से टकरा जायगी या उलट जायेगी और ड्राइवर को अपनी हेकड़ी का नतीजा भोगना पड़ेगा। गायत्री का सिग्नल हमें सावधान करता है कि अपनी जीवन नीति की रेल को सही मार्ग पर ले चलो अन्यथा अपने स्वाभाविक सुखों से हाथ धोना और दुखों की यातनाओं से पीड़ित होना पड़ेगा।
गायत्री के प्रथम चरण में दूसरों के प्रति आत्मीयता, ममता, प्रेम, उदारता, ईमानदारी, सेवा एवं मधुरता का व्यवहार करने की शिक्षा जिसके अन्तःकरण में विराज गई होगी, माता ने जिसको अपने प्रथम चरण का स्पर्श करने दिया होगा, वह अनेक सामाजिक कष्टों से अनायास ही छूट गया होगा।
अपने कुटुम्बियों, पड़ौसियों, समीपवर्ती लोगों, के साथ यदि विरोध, मनोमालिन्य, द्वेष, संघर्ष, कलह, चलता हो तो वे हमें इतना सहयोग नहीं देंगे जितना कि देना चाहिए। जबकि उनकी सद्भावना की आशा की जाती है, तब भी वह प्राप्त नहीं होगी। इसके अतिरिक्त वे विरोधी होने के कारण तरह-तरह की बाधाएं उत्पन्न करते रहेंगे और हानि पहुँचाने वाले आयोजन, षड़यन्त्र या आक्रमण करने का जब भी उन्हें अवसर मिलेगा, न चूकेंगे। मुकदमा, फौजदारी, चोरी, डकैती, कत्ल, बहिष्कार, अपमान, शिकायत, चुगली, निन्दा, दोष प्रदर्शन आदि हानियाँ अकस्मात तो कभी कभी ही होती है, अधिकाँश उनके पीछे पुरानी शत्रुता या किसी विरोधी का गहरा मनोमालिन्य काम करता रहता है। जो व्यक्ति अपने से असंतुष्ट हैं या द्वेष रखते हैं, बहुधा उन्हीं का ऐसे कार्यों में विशेष हाथ रहता है।
क्रमश जारी........
अखण्ड ज्योति 1951 अगस्त
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