क्या सच में हर दिन पुनर्जन्म होता है ?
प्रातःकाल की संध्या, सायंकाल की संध्या — क्या करें? क्या करना चाहिए? क्या विचार करना चाहिए? आपको इन दोनों समय में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना करनी चाहिए।
प्रातःकाल जब उठा करें, तो आप अपने आप को एक नया जन्म हुआ अनुभव किया करें। यह अनुभव किया करें कि रात को सोने का अर्थ है पिछला जन्म, और अब सुबह उठने का अर्थ है नया जन्म। जब आँख खुली, तो नया जन्म। आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आए। आप यह सवेरे हर दिन अनुभव कीजिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ।
अब नए जन्म में क्या करना चाहिए? आपकी सारी बुद्धिमानी इस बात पर टिकी हुई है कि आपने अपनी जीवन-संपदा का किस तरीके से उपयोग किया। बस एक ही बुद्धिमानी है।
यह मानना सही नहीं है कि यह जन्म भजन करने के लिए मिला हुआ है। भजन करने के लिए नहीं मिला हुआ है, कर्तव्य करने के लिए मिला हुआ है। और इसलिए मिला हुआ है कि आप इस जन्म की संपदा को ठीक तरीके से इस्तेमाल करें। यह आपकी परीक्षा है। परीक्षा में जो पास हो जाते हैं, फिर क्लास चढ़ा दिए जाते हैं और आगे चले जाते हैं।
अगर आप यह पहली परीक्षा, जो भगवान ने आपको मनुष्य का जीवन देकर दी है, उसमें पास हो जाएँ, तो आपका एक ही फ़र्ज़ हो जाता है — कि आपको इस जीवन का अच्छे से अच्छा उपयोग करके दिखाना है। बस भगवान ने यही अपेक्षा की है आपसे, और यही उसकी उम्मीद है, और यही वह चाहता है।
न आपसे पूजा चाहता है, न उपवास चाहता है, न भजन चाहता है, न आपके उपहार चाहता है, न मिठाई चाहता है, न कपड़े चाहता है, न कीर्तन चाहता है, न कथा चाहता है। इन बातों से भगवान का कोई ताल्लुक नहीं है। यह तो अपने आप की परिशोधन की प्रक्रियाएँ हैं, जिन्हें न जाने क्यों लोगों ने यह मान लिया है कि इससे भगवान प्रसन्न हो जाएगा।
आप विश्वास रखें — इससे भगवान किसी कारण प्रसन्न नहीं हो सकता। इससे आपके जीवन का संशोधन करने में, अपने कषाय-कल्मष का निवारण करने में सहायता मिल सकती है — इसमें संदेह नहीं। पर जहाँ तक भगवान की प्रसन्नता का ताल्लुक है, वहाँ सिर्फ एक बात है — कि आपको जो बहुमूल्य मनुष्य का जीवन दिया गया था, उस जीवन का आपने किस तरीके से और कहाँ उपयोग किया।
बस एक प्रश्न है। दूसरा कोई प्रश्न नहीं।
जब आपको यह दिया गया है, तो भगवान ने अपनी सबसे बहुमूल्य संपत्ति आपके हाथ में सुपुर्द कर दी है। इससे बड़ी संपत्ति भगवान के खजाने में कोई नहीं है — आप विश्वास रखें।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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