आध्यात्मिक-जीवन का मर्म (भाग १)
मैं आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म मानता हूँ। शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा। मन को जीवन का केन्द्रबिन्दु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखूँगा। कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहूँगा।
युग−निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहला स्थान आस्तिकता का है। ईश्वर में आस्था रखे बिना हमारी दुष्प्रवृत्तियाँ बिना नकेल के ऊँट की तरह, बिना लगाम के घोड़े की तरह बिना नाथ के बैल की तरह बिना अंकुश के हाथी की तरह उच्छृंखलता, अनीति और उद्दंडता की ओर द्रुत गति से दौड़ने लगती हैं। पानी को ऊँचा चढ़ाने के लिए अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं पर नीचे की ओर तो वह बिना किसी प्रयास के ही बहने लगता है। मन की गति भी पानी के समान है, उसे स्वर्ग पर चलाना हो तो अत्यधिक श्रमसाध्य साधन प्रयत्न करने पड़ते हैं पर कुमार्ग की ओर तो वह सहज ही सरपट दौड़ने लगता है। आस्तिकता मन को कुमार्ग पर दौड़ने से रोकने के लिए सबसे बड़ा अंकुश सिद्ध होता है।
पाप को छिपा लेने और तब दण्ड से बचे रहने की अगणित तरकीबें मनुष्य ने ढूँढ़ निकाली हैं। यों अदालत, पुलिस, जेल, कचहरी सब कुछ व्यवस्था अपराधों के लिए मौजूद है, पर उनसे बचे रहकर अनीति बरतते रहने की जितनी कुशलता मनुष्य को प्राप्त है उसकी तुलना में राजदंड के सारे साधन तुच्छ मालूम पड़ते हैं। रिश्वत को ही लीजिए वह एक बड़ा अपराध माना गया है और उसके लेने एवं देने वाले के लिए कई वर्ष की जेल का विधान है। इतने पर भी अदालतों तक में पुलिस तक में, जेल तक में रिश्वत कितने प्रचंड रूप में मौजूद है उसे हर कोई जानता है। अपराधों को रोकने वाले जब अपराध करने से नहीं रुकते तो जन साधारण से तो आशा ही क्या की जाय? डर दिखाते रहने के लिये मर्यादा माध्यम के रूप में यह सब मौजूद है उसे मौजूद रहना भी रहना भी चाहिए, पर समस्या का हल इनके द्वारा होने वाला नहीं है।
जब तक मनुष्य अपने कर्तव्य धर्म का कठोरतापूर्वक पालन करने के लिए स्वयं ही श्रद्धा और विश्वासपूर्वक कटिबद्ध न होगा तब तक उसे बलात् सन्मार्गगामी बनाया जा सकना कठिन है। अधिनायकवाद के नृशंस आतंक द्वारा कुछ हद तक पापों की रोक−थाम संभव है। चोर के हाथ काट देने और व्यभिचारी का सिर उड़ा देने जैसे आतंकपूर्ण दंड लोगों को डरा तो देते हैं पर जिनके हाथ में ऐसी दंड व्यवस्था रहती है वे ही आतंकित जनता से प्रतिरोध के बारे में निश्चिन्त होकर स्वयं ही अनीति करने लगते हैं। डिक्टेटरशाही का इतिहास यही बताता है। फिर आतंकित जनता भीरु और कायर बनती है, उसकी आत्मिक स्थिति बहुत दुर्बल हो जाती है जिससे उसके स्वभाव में छोटे छोटे अनेकों दोष दुर्गुण प्रविष्ट हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप मनुष्य का व्यक्तित्व दिन−दिन दीन−हीन बनता चला जाता है। आतंकित लोगों में से महापुरुषों एवं नररत्नों का उत्पन्न होना भी संभव नहीं रहता। फिर यह आतंकपूर्ण स्थिति समाप्त होते ही वह दबी हुई अपराधी मनोवृत्ति जब अनेकों गुने भयंकर वेग से विकसित होती है तब उसका रोका जा सकना अतीव कठिन हो जाता है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1962 सितम्बर
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