यौवन का प्रभात तथा सावधानी
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बालक के जीवन में 14 से 21 वर्ष के मध्य की अवस्था बड़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें बचपन छूटता है तथा यौवन का प्रभाव खिलता है। लड़के और लड़कियों में यौवन सम्बन्धी अनेक प्रकार के आन्तरिक एवं बाह्य विकास होते हैं। इस वय में संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है। आवारा लड़कों की संगति में पड़कर बड़े घर के बालक भी गन्दी आदतों के शिकार बन जाते हैं, गाली गलौज करते, बदतमीजी करते, वेश की ओर से लापरवाह हो जाते हैं। बालकों के आवारा बनने का एक कारण यह भी है कि उन्हें घर पर पर्याप्त प्रेम, सौहार्द, महत्ता और मनोरंजन के अवसर नहीं प्राप्त होते हैं, घर पर या तो कोई फिक्र नहीं करता या बहुत कम करता है। वे गलियों में आवारा लड़कों के साथ रहते हैं तथा वैसी ही आदतें सीखते चलते हैं।
अनेक माता-पिता बालकों की इस चढ़ती हुई अवस्था में की गई शरारतों को बड़ी कठोरता, डाट फटकार से सुधारने का प्रयत्न करते हैं। माता प्रायः क्रोध की उत्तेजना में आकर जली-कटी बातें सुनाती हैं, कुछ व्यक्ति मारपीट कर बैठते हैं। कटुता, संघर्ष और क्रोध के इस वातावरण में नया युवक घर से अतृप्त होकर सदा के लिये उसे छोड़ देता है। उद्विग्नता को बुरा प्रभाव बालक के भावी जीवन पर पड़ता है। बालक भी क्रोध, घृणा, भय, ईर्ष्या, विकारों से आक्रान्त होते हैं तथा ये मनोविकार शीघ्रता से मानसिक और शारीरिक बीमारियों में परिणत हो जाते हैं। माता-पिता या शिक्षक की असावधानी से (1) भयानक स्वप्न देखना, (2) अकेले रहने से डरना, (3) अन्धकार से डरना, (4) याद किया हुआ पाठ भूल जाना, (5) स्वप्न में उठ कर घूमना, (6) सबसे चिढ़ना (7) घर के सामान को तोड़ना (8) आग से खेलना, (9) घर से भाग जाना इत्यादि मानसिक बीमारियां उत्पन्न होती हैं। प्रेम, आत्मविश्वास, निर्भयता के वातावरण से इन्हें दूर किया जा सकता है।

