बच्चे का मानसिक एवं भावात्मक विकास
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तीन से छह वर्ष की अवस्था में मन अपना कार्य प्रारम्भ कर देता है। प्रारम्भ में घरेलू वातावरण में उसे जो मानसिक संवेदनाएं, विचार या अनुभव प्राप्त हुए हैं, वे अब क्रमशः उनके चरित्र तथा प्रारम्भिक कार्यों में स्पष्ट होने लगते हैं। बालक परिस्थिति को समझने लगता है। उसका व्यक्तित्व निर्मित होने लगता है। बालक हाथ, पांवों, त्वचा तथा नेत्रों के नाना अनुभवों से ज्ञान-वृद्धि करने लगता है। घर की गरीबी, योग्य शिक्षक का अभाव, अनुकूल व्यवस्था की कमी होने पर बच्चे का मानस विकास उचित गति से नहीं चल पाता।
मैडम मौन्टेसरी नामक बाल शिक्षण विशेषज्ञा का कथन है कि तीन से छह वर्ष की आयु में बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है किन्तु शिक्षण का संस्कार बालक की स्वयं प्रवृत्ति पर ही सध सकता है, अर्थात् उसके स्वप्रयत्न पर ही निर्भर होता है। उसके अतिरिक्त बच्चा चरित्र के विकास के लिए भी योग्य बन जाता है, पर इस आयु में बालक अपने द्वारा ही विकास की बातों को ग्रहण कर सकता है। ये तत्व उस पर लादे नहीं जा सकते।
चरित्र एवं बच्चे के भावात्मक विकास के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को बच्चे के समक्ष उच्च आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए। वह हमारी आदतें, पूजा ढंग, भजन कीर्तन, शिष्टाचार, वस्त्र पहनने के तरीके, स्नान, भोजन के ढंग कुछ-कुछ सीख सकता है। छह वर्ष का बालक आज्ञा द्वारा नीति की भी कई बातें सीख सकता है। इस आयु में बालक सबसे अधिक शब्द मांगता है। माता पिता को चाहिए कि उसे अच्छे से अच्छे शब्द सीखने के लिए दें। उच्च महापुरुषों के नाम, उनके अनेक मित्र, शहरों के नाम, नये-नये फलों, तरकारियों, वस्तुओं के नाम उच्चारण करने में उसे विशेष उत्साह प्राप्त होता है। तीन से छह वर्ष की आयु में प्रत्यक्ष वस्तुओं द्वारा नाना वस्तुओं के नाम सिखाना चाहिए।
इस आयु में बालक की कल्पना शक्ति भी क्रमशः विकास पथ पर होती है। अतः परियों, जादू की कहानियां, अद्भुत वस्तुओं के विषय में बातचीत में वे विशेष रस लेते हैं। ज्यों-ज्यों अनुभव वृद्धि होती है, इसी कल्पना द्वारा बालक अपने ज्ञान की वृद्धि करता है। परिस्थिति से अनुभव प्राप्त कर कल्पना को जोड़ कर वह सांसारिक ज्ञान बढ़ाता है। नवीन बातों की जिज्ञासा उसके मन में उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। वह आस-पास के व्यक्तियों से नाना प्रकार के कौतूहल जनक प्रश्न पूछ कर अपनी जिज्ञासा शान्त करना चाहता है।
सावधान! बच्चे के ये प्रश्न उसके भावी सांस्कृतिक और शिक्षा सम्बन्धी विकास में बड़ा महत्व रखते हैं। इन प्रश्नों का दम कदापि न करें। उन्हें ऐसे उत्तर दें जिसे वह ग्रहण कर सकें और उनकी जिज्ञासा-तृप्त हो सके। उत्तर देते समय तीन बातें स्मरण रखिये। (1) बाल मानस का ज्ञान, (2) परिस्थितियों की जानकारी, (3) विषय को सरलतम बनाकर समझाने की कला। शंकाओं को इस प्रकार निवारण करें कि बच्चे की उलझनें स्पष्ट हो जांय तथा वह पूर्ण संतुष्ट हो जाय।

