शिशु की मौलिक आवश्यकताएं—
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शिशु की प्रारम्भिक आवश्यकताएं हैं शरीर के लिये आराम, सुरक्षित समझने का आन्तरिक भाव तथा समुचित खुराक। प्रारम्भ में नवजात शिशु में इन्द्रिय सुख की ही प्रधानता होती है। उसके मन में मूल भाव अपने आपको सुरक्षित समझने का होता है। यदि तनिक सी भी लापरवाही की जाय तो शिशु के मन में ‘भय’ का भाव अपनी जड़ें जमा सकता है। अतएव आपके पालन पोषण की रीति ऐसी होना चाहिये कि बच्चा डर न जाय, उसके मन में भय की भावना न बैठ जाय। वह अपने आपको सुरक्षित समझता रहे। प्रारम्भ में कोई उसके पास रहे, उसे प्यार दुलार करे, अकेला न छोड़े, अकस्मात् ऊंची आवाज उसके कानों पर न डाले, तेज रोशनी न दिखावे, रात्रि में अकेला न छोड़े, किसी भयानक उपाय से उसे हंसाने की चेष्टा न करें, भीरु और अस्थिर तरीके से उसे न हिलाये डुलायें।
डा. मेक्डानल्ड लेडाल के अनुसार ‘‘अधीर और तेज स्वभाव वाली नर्सें बच्चे के कोमल संस्थान में तुनुक मिज़ाजी उत्पन्न कर देती हैं। कपड़े उतारते पहनाते हुए उसमें एक प्रकार की अधीरता और घबराहट का भाव भर देती हैं। अकस्मात् चौंका देने वाला खटका शिशु के समीप नहीं होना चाहिए।’’
किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि आप उसके पास साधारण शोर भी न करें, या बातचीत इत्यादि भी रोक दें। नहीं, साधारण शोर चलता रहे तो भी कुछ हर्ज नहीं है। चलने फिरने, बोलने, बातचीत करने, साधारण मध्यम गाने-बजाने की ध्वनि से शिशु को कोई बाधा नहीं पहुंचती है। बच्चा नींद से तभी उठता है, जब कच्ची नींद में सो जाता है। अत्यधिक प्रेम, पुनः-पुनः बच्चे को उठाना, रह-रह कर उसके विषय में चिन्ता करना, उसके सम्बन्ध में असाधारण खबरदारी, गुप्त अलक्षित रूप से बच्चे के मानसिक संस्थान पर प्रभाव डालकर उसे बनाया करते हैं।

