चिढ़ने वाले बच्चे
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अनेक बालकों को चिढ़ने की आदत होती है। चिढ़ने वाला बालक अपना आत्म सम्मान खो बैठता है। बच्चा प्रायः जिस प्रेम, सहानुभूति, सौहार्द की आशा अपने परिवार से करता है, उसे नहीं पाता। उसके मन में आत्म अपमान की विषम वेदना निवास करती है। उसे उन व्यक्तियों से भारी घृणा होती है जो उसे चिढ़ाते हैं। वह स्वयं भी चिढ़कर उनका तिरस्कार करने का प्रयत्न किया करता है। जिन बालकों का समाज में पर्याप्त आदर नहीं होता, वे भी अन्तर की ठेस के कारण चिढ़ने लगते हैं। आरम्भ काल की कुचली हुई आत्म सम्मान की भावना कभी-कभी बड़े होने पर भी चलती रहती है। बात यह है जो व्यक्ति जिस भावना को दृढ़ता से अन्तर्मन में धारण कर लेता है और उत्तरोत्तर उसी का अनुभव करता चलता है, वैसा ही बनता जाता है। आत्म अपमान स्थायी घृणा के रूप में परिवर्तित होकर बच्चों को चिढ़ाने वाला बना देता है।
इस संबंध में प्रो. लालजीराम शुक्ल की सम्मति माननीय है, ‘‘अध्यापक तथा अभिभावक का कर्तव्य है कि बालक को ऐसी घटनाओं से सतर्क करता रहे, जिनसे उनका जीवन क्लेशमय हो जाने की सम्भावना है। यदि वे बालक की चेष्टाओं को सतर्कता से देखते रहे और उन्हें प्रशस्त मार्ग का अनुसरण कराते रहें, तो उनका वास्तविक आदर्श बना सकते हैं। मानसिक ग्रन्थि उदय होने का अवसर न देना चाहिए। यदि किसी प्रकार मानसिक ग्रन्थि का उदय हो जाय तो उसके दूर करने का उपाय करना चाहिए।’’
दूर करने का उपाय यह है कि उस भाव के विरोधी सद्गुण को प्रोत्साहित किया जाय। प्रेम, सहानुभूति और आत्म सम्मान की भावनाएं विकसित की जांय।

