प्रारम्भिक संस्कारों का महत्व—
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प्रथम वर्ष में बच्चा माता के संसर्ग तथा उसके दूध पिलाते समय के विचारों से व्यक्तित्व प्राप्त करता है। हमारी नब्बे प्रतिशत माताएं यह नहीं समझतीं कि उनके इर्द-गिर्द रहने वाले विचारों का वातावरण उनके नन्ने-मुन्ने पर कितना महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रहा है। जिन माताओं को अनचाही या अनैतिक दृष्टि से प्राप्त की हुई सन्तान होती है तथा जो निरन्तर अपनी अनैतिकता के विषय में गुपचुप चिन्तन किया करती हैं, उनका दूषित प्रभाव बच्चे पर पड़ता है और वह नैराश्य, खिन्न, चिड़चिड़ा और आत्महीनता की ग्रन्थि से युक्त बनता है। बच्चे को दूध पिलाने वाली माताओं को विषय सम्भोग इत्यादि से विष की तरह बचना चाहिए क्योंकि इस प्रकार के दूषित विचारों वाली माता का पुत्र कामी लम्पट और आवारा हो सकता है। अत्यधिक क्रोधी, उत्तेजित या बात-बात पर बिगड़ उठने वाली माताओं के बच्चे उग्र स्वभाव के बनते हैं। इसका कारण बच्चे के प्रारम्भिक संस्कार हैं। माता-पिता द्वारा बोले जाने वाले या उनके मन में मौजूद रहने वाले सद्भाव अथवा दुर्भाव अपनी अमिट छाप (इम्प्रेशन) बच्चे के मानस-पटल पर छोड़ जाते हैं। सावधान! बच्चा आपसे अपने प्रारम्भिक संस्कार प्राप्त करता है।
आप जिस प्रकार घर में रहते हैं, उठते बैठते या व्यवहार करते हैं, घर में जैसी शिष्टता या अशिष्टता चलती है, जो-जो अच्छी बातें या गालियां दी जाती हैं, जो प्रवृत्तियां उसके समीप के वातावरण में दिन भर चला करती हैं, उन समस्त परिस्थितियों, आपके व्यवहारों से बालक अपने संस्कार ग्रहण करता है। यह मत समझिये कि इस नन्हे के मस्तिष्क में आपके व्यवहार को समझने की शक्ति नहीं है। उसके पास वे सभी बौद्धिक शक्तियां हैं जो आपके विकसित मस्तिष्क में हैं। आपके हर्ष, क्रोध, प्यार, तिरस्कार, द्वेष इत्यादि समस्त भावों को नन्हा मस्तिष्क ग्रहण करता चलता है। उसका प्रारम्भिक ज्ञान अंधानुकरण पर आधारित है। आप उसके लिए ऐसे जीवित आदर्श हैं, जिससे उसे अपने गुप्त मन के असंख्य संस्कार बनाने हैं।
बचपन के संस्कारों में जीवन का बड़ा महत्व है। ये संस्कार बीज रूप से बच्चे के मस्तिष्क में संग्रहीत रहते हैं तथा उनके कार्यों को संचालित किया करते हैं। जटिल भावना ग्रंथियों का निर्माण बचपन के संस्कारों से ही होता है। बड़ा हो जाने पर भी गुप्त रूप से गालियों, अशिष्टता सूचक व्यवहारों या अश्लील शब्दों के प्रयोगों द्वारा प्रायः बचपन के कुसंस्कार व्यक्त हुआ करते हैं। कुसंस्कारों में प्रारम्भिक जीवन व्यतीत करने वाला बालक बूढ़ा होने पर भी उन्हीं का दास बना रहता है।

