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Books - मनचाही सन्तान

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Language: HINDI
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बच्चों की दुर्बलताएं तथा सुधार

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           अपराधी बच्चे—

बच्चा अपराध क्यों करता है? इसके उत्तर में यह कहना अनुचित न होगा कि प्रवृत्ति परिस्थिति और वंश परम्परा दोनों पर निर्भर है। अपराधी बच्चों के पास रहते-रहते अच्छे बच्चे भी प्रायः अपराधी बन जाते हैं। अनुपयुक्त वातावरण, अत्यधिक लालच, अन्तर्मन में छुपी हुई गुप्त इच्छाएं, अनुवांशिक न्यूनता और मानसिक संघर्ष ही अपराध के मुख्य कारण हैं। श्री एल.ए. एवरिल के मतानुसार उनकी पुस्तक ‘‘एडोलोसेन्स’’ में अपराध के निम्न कारण बतलाये गये हैं—

(1) साहसिक कार्यों को करने की अभिलाषा — यौवन के प्रारम्भ में सनसनी पूर्ण, भयावह तथा साहसिक प्रवृत्तियों का प्राधान्य होता है। युवक प्रारम्भ से ही दंगा-फसाद, हुड़दंगबाजी या शरारत की ओर प्रेरित होते हैं। (2) बाहर के अनुभवों का वैषम्योत्पादक प्रभाव — बाहर के मित्रों के दलों की घनिष्ठता, प्रेम, मजेदारी, घरेलू जीवन को अप्रिय बना देती है। घर पर कोई साहसिक कार्य करने का मौका नहीं मिलता। इसलिये बाहर जाकर अपराध किया जाता है। (3) बुरे की संगति से बुराई की उत्पत्ति — गुट्ट के जीवन के असर से बढ़कर अपराध की भावना को प्रेरित करने वाली अन्य कोई वस्तु नहीं है। (4) महत्ता की इच्छा, गुनहगार की महत्ता, सुगमता से धन पाने की इच्छा, उबा देने वाला आलस्य, अत्यधिक कामेच्छा इत्यादि कारणों से अपराध में प्रवृत्ति हो जाती है।

अपराधी युवक से घबराने के स्थान पर बड़ी शान्ति एवं प्रेम से उसका सुधार करना चाहिये। उत्तेजित या निराश होने से कोई कार्य न हो सकेगा। डाट फटकार अपराध की अभिवृद्धि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर सकती।

सर्व प्रथम आप उसके प्रति अपना रुख बदल दीजिए। अर्थात् नाराजगी, क्रोध, आवेश के स्थान पर प्रेम, सहानुभूति और शान्ति को उपयोग में लाइये और इनको आप प्रयोग में ला रहे हैं, यह बात उस पर प्रकट होते रहने दीजिये। जब उसे यह ज्ञान हो जायगा कि आपका दृष्टिकोण बदल गया है, तो वह आपके समीप आने से नहीं डरेगा।

बिगड़े हुए बालक में जो अच्छाइयां हैं उन्हें पहचानिये और उनकी खुले मुंह से प्रशंसा कीजिए। प्रशंसा की मिठाई पाकर वह उन्हीं गुणों को विकसित करेगा। ये सद्गुण बढ़कर बुराइयों पर हावी हो जायेंगे और खराबियां स्वयं अदृश्य हो जायेंगी।

माता-पिता को समय के अनुसार चलना चाहिये। यदि बच्चों में कुछ खराबियां भी हैं, तो उन्हें टालकर उनसे प्रेम करना चाहिए। मित्र भाव सर्वोत्कृष्ट रसायन है। माता-पिता को मित्र भाव का व्यवहार करना चाहिये। मित्रता का दृष्टिकोण धीरे-धीरे बालक के मन में खोया हुआ प्रेम और विश्वास उत्पन्न कर देता है।

माता-पिता को अपनी तबियत पर काबू रखना चाहिये और बालक के विवेक, बुद्धि, इत्यादि को स्वयं विकसित होने देने का अवसर प्रदान करना चाहिये। अधिक डाटना फटकारना अनुचित है। प्रेम भाव से धीरे-धीरे उसमें सुधार करें। जैसे-जैसे सुधार का कुछ भी फल प्राप्त हो, बच्चे की प्रशंसा और प्रोत्साहन करना चाहिये। प्रशंसा स्पष्ट रूप से खुल कर करें और मुक्त कंठ से करें। प्रशंसा का पुरस्कार पाकर बच्चा स्वयं आपकी ओर उन्मुख होगा तथा जिन गुणों, आदतों, व्यवहार के लिये आप उसकी प्रशंसा करते हैं, उन्हीं को उत्तरोत्तर विकसित करेगा स्मरण रखिए, आपकी प्रत्येक प्रशंसा भरी मुस्कान तथा प्रोत्साहन का अभिप्राय यही होगा कि वह आपकी प्रशंसा पाने के लिए उन्हीं गुणों को स्वयं विकसित करेगा। बच्चे प्रशंसा की मिठाई का लाभ संवरण नहीं कर पाते।

घर का वातावरण यथासम्भव मधुर बनाइये। प्रत्येक व्यक्ति बिगड़े बच्चे से शिष्टता तथा सौहार्द का व्यवहार करे। बच्चे के मन में कुटुम्बियों के प्रति जो कटुता का भाव है, वह दूर हो जाना चाहिए, जिससे वह सब में आत्म भाव का दर्शन करे सबमें प्रेम की प्रतिच्छाया का दर्शन करे।

बच्चे को कुछ उपयोगी कार्य दीजिए जिससे उसकी अधिक शक्ति उसके उपयोग में आ सके। शरारती बच्चे प्रायः अपनी बढ़ी हुई शक्ति को निकालने का मार्ग ढूंढ़ा करते हैं। जब उन्हें स्वस्थ और उपयोगी मार्ग नहीं प्राप्त होते, तब वे अनुपयोगी और गन्दे मार्गों द्वारा अपनी बढ़ी हुई शक्ति को निकालते हैं। यदि उन्हें स्वस्थ मार्ग (जैसे-खिलौने बनाना, पुस्तकें पढ़ना, संगीत, खेल, भ्रमण, कविता पाठ करना, चित्रकारी, फुलवारी) प्राप्त हो जांय और इनकी ओर कोई निरन्तर प्रोत्साहन देता रहे तो निश्चय ही ये उनके स्वभाव का 1 अंग बन जायेंगे और वे गंदगी का मार्ग त्याग देंगे। यदि बच्चा अनुपयोगी मार्गों में अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है तो, इसमें अपराध माता-पिता का ही है, जो शक्ति के सही और स्वस्थ मार्गों की ओर बच्चों को उन्मुख नहीं करते हैं। वह कुसंगति में अनुचित मार्ग ढूंढ़ लेता है।
    
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