यौन सम्बन्धी जटिलताएं—
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अनेक ग्रंथियां बालकों की यौनगत भूलों से सम्बन्धित होती हैं। यों तो गुप्त अंगों में क्षणिक उत्तेजना प्रारम्भ से ही थोड़ी बहुत होती है, किन्तु बारह से चौदह वर्ष की आयु में यौवन का प्रभात आरम्भ हो जाता है। कभी-कभी माता-पिता बालक के शयन-कक्ष में ही वासना-निरत रहते हैं और जब बालक को सोता हुआ समझते हैं, तब वह चुपचाप उनकी प्रणय क्रीड़ा देखा करता है। उद्विग्नता और कौतूहल से भी उन्हें यौनगत उत्तेजनाएं प्राप्त होती हैं। हमारी वर्तमान शिक्षा संस्थाओं में अनेक घातक रोग फैल गये हैं। सुन्दर बालक और युवक एक दूसरे के साथ नितांत अवांछनीय रीति से गन्दा व्यवहार करते हैं। इनका सम्बन्ध कामुकता से भरा हुआ होता है। सिनेमा में गन्दे दृश्य देखते-देखते बाजारू युवक ऐसे खूबसूरत बच्चों की ताक में रहते हैं और उनके सम्पर्क में रहकर अपनी वासना शांत करने के दुष्प्रयत्न करते हैं। शिक्षालयों, बोर्डिंग हाउसों, सिपाहियों तथा बाजारों में युवकों और सुन्दर बच्चों का यह कामुकता पूर्ण दुर्व्यवहार चलता रहता है।
एडवर्ड कारपेण्टर, जे.ए. साइमाण्ड्स, वाल्ट व्हिटमेन हेवलाकएलिस आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य की इस कामुकता जन्य निर्बलता का संकेत किया है। शिक्षकों तथा माता-पिताओं को बच्चों को ऐसे दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों से बचाना चाहिए। प्रत्येक स्कूल कालेजों में ऐसे कामुक पूर्ण प्रकृति वाले गुण्डे विद्यार्थियों का समुदाय रहता है जो खूबसूरत विद्यार्थियों को डराता धमकाता है जिससे वह इन शैतानों की गुट में सम्मिलित होकर उनकी कामवासना की पूर्ति का साधन बनें। ऐसे दुष्ट साथियों से बच्चों का सर्वनाश होता है, गुदा मैथुन से डरे हुए विद्यार्थियों में से यौवन की धीरता, दृढ़ता, साहस इत्यादि विलुप्त हो जाते हैं। जीवनी शक्ति का ह्रास होता है, अध्ययन में मन नहीं लगता और मेधाशक्ति विलुप्त हो जाती है। अतः ऐसे दुष्ट प्रकृति के सहपाठियों से अपने बच्चे की रक्षा कीजिए।
बच्चों को घृणित कामवासना की उत्तेजना करने वाले फिल्म न दिखलाइये। सिनेमा अभिनेत्रियों के चित्र मत खरीदने दीजिए। पान, सिगरेट, गाना, बनाव श्रृंगार की ओर मत झुकने दीजिए। यथा सम्भव उसे घर पर ही रखिये और घर को ऐसा अच्छा बनाइये कि उसका मनोरंजन घर पर ही हो सके। सद्-ग्रन्थ पढ़ने को दीजिए। प्रातःकाल भजन, पूजन इत्यादि की आदतों का शुरू से ही विकास प्रारम्भ करदें। श्रृंगार प्रधान नाटक, गन्दे उपन्यास, अश्लील कहानियां, घृणित चित्र और विषय सम्बन्धी कुरुचि पूर्ण गाने मुख से उच्चारण न होने दीजिये। स्त्रियों के साथ बातें करना, युवतियों की ओर ताकना पापी स्वभाव के लक्षण हैं। यथासम्भव आपके पुत्र को स्त्रियों के साथ खेलना अधिक बैठना, उठना, मनोविनोद करना, नीचतापूर्ण संकेत करना, गन्दी कविताएं स्मरण नहीं कराना चाहिए। उन्हें अच्छे से अच्छे व्यक्तियों की संगति में रखिये। सत्संग से निःसंग की प्राप्ति होती है, सद्विचार उत्पन्न होते हैं, सत्य, प्रेम, दया, उत्साह, महत्वाकांक्षा का यथार्थ ज्ञान तथा निश्चय होता है। तुलसी का वचन बड़ा मनोवैज्ञानिक है—‘‘शठ सुधरहिं सत् संगति पाई। पारस परसि कुधातु सुहाई।।’’ योगवशिष्ठ, गीता, रामायण, दासबोध, भागवत इत्यादि उपकारी ग्रन्थ सरल भाषा में उनके पास रख कर उनमें उनकी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए।
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