आज्ञापालन की आदत—
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अनेक बार विद्यार्थियों की अशिष्टता, बुरी आदतों तथा दुष्टताओं पर आपको क्रोध आयेगा, झुंझलाहट और नाराजी से आप उत्तेजित हो उठेंगे, किन्तु शिक्षण के कार्य को आप मारपीट या डंडे के जोर से नहीं कर सकते। ऐसे अवसरों पर आपको क्षमा से कार्य लेना होगा। यदि आप उसका सुधार करना चाहते हैं तो उसका बड़े से बड़ा गुनाह माफ करना होगा। उसके दुर्गुण को घृणा करने के स्थान पर प्रेम कीजिए, उसकी लाचारियों के प्रति सहानुभूति प्रकट कीजिए और उसके सद्गुणों को पर्याप्त प्रोत्साहन प्रदान कीजिए। आप देखेंगे कि बच्चा धीरे-धीरे आपकी आज्ञाओं का पालन करने लगेगा। बच्चा कुछ विकास कर सके इसके लिए यह आवश्यक है कि वह आपकी आज्ञाओं का पालन करे। आज्ञाओं का पालन करना भी एक आदत है, किंतु यह आदत हुक्म, दण्ड या मारपीट की यंत्रणा के बल पर नहीं डाली जा सकती, उसे फुसलाकर, प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण सद्व्यवहार द्वारा प्रोत्साहन तथा प्रशंसा के बल पर डाली जा सकती है। बुरी आदत छुड़ाने का सर्वोत्तम उपाय उसके विपरीत अच्छी आदत का विकास करना है।
शिक्षक को चाहिए कि बालकों की व्यक्तिगत कठिनाइयों को समझ कर शिक्षा का कार्य करे। क्लास-शिक्षण से प्रायः साधारण बुद्धि के बच्चों को लाभ नहीं होता है। पिछड़े रहने वाले बच्चे विशेष ध्यान चाहते हैं। चूंकि कक्षा में वे पीछे रहते हैं, उनका मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता। अनेक बालकों का मन पढ़ाई में न लगकर ऐसे कार्यों में लग जाता है, जो समाज के हित का नहीं होता, न वे अपनी शक्तियों का पूर्ण उपयोग ही कर पाते हैं। जिन्हें मूर्ख और गुण्डे दिमाग का कह कर छोड़ दिया जाता है, उन बच्चों को विशेष ध्यान की आवश्यकता रहती है। उनकी बुद्धि के अनुसार ही थोड़ा-थोड़ा ज्ञान देना चाहिए। योग्यता के अनुसार धीरे-धीरे वे पर्याप्त कर लेते हैं।

