शिशु के व्यक्तित्व का निर्माण
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प्रारम्भिक आदतों का विकास करने के लिये आपको उसे आभास कराना होगा। पुनः पुनः जिन आदतों को दुहराया जाता है, वे बच्चे के गुप्त मन में जटिल मानसिक ग्रन्थियों का रूप धारण कर लेती हैं। अपने विवेक द्वारा स्थिर कीजिए कि कौन-कौन आदतें आप उसमें डालना चाहते हैं? उदाहरणार्थ निम्न आदतें विकसित कीजिये—
(1) मल मूत्र त्यागना — इसके लिये आपको समय निश्चित करना होगा और प्रति दिन उसी समय बच्चे को मल त्याग के लिए उठाना या बिठाना होगा जो मातायें बच्चे को प्रतिदिन छह-सात बजे मल के लिये प्रेरित करती हैं, वे स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़ी शुभ बात करती हैं। इसी प्रकार प्रतिघण्टा मूत्र त्याग के लिए प्रेरित करना उचित है। छोटे बच्चे को मूत्र जल्दी-जल्दी आता है। अतः समझदारी से काम लें और कपड़ों पर मूत्र त्याग न करने दें।
(2) भोजन सम्बन्धी सावधानियां रखें अर्थात् दूध पिलाने का एक निश्चित समय निर्धारित करलें। उसी समय पेट भर कर पिलादें। सावधान! बच्चा किसी खेल में लग कर भूखा न रह जाय अन्यथा वह मध्य ही में रोने बिलखने लगेगा। अनुभव और अभ्यास द्वारा यह मालूम हो जायगा कि बच्चे को कितना दूध चाहिये। आयु के अनुसार यह बढ़ता जायगा। जैसे-जैसे बच्चा बढ़े उसे फलों के रस, पतली पकी हुई दाल चावल, बिना मिर्च की सब्जी चटाने का क्रम रखना चाहिये। यथा सम्भव मां का दूध ही पिलाना चाहिये। दूध पिलाते समय मां के शरीर के साथ जो स्नेहमय सम्पर्क शिशु को प्राप्त होता है, उससे शिशु को प्रेम, सहानुभूति, मृदुता, हंसमुख होना, प्रसन्नता, निर्दोषपन, आन्तरिक शान्ति, सौजन्य, तृप्ति, इत्यादि मनोभावों का विकास होता है। माता को दूध पिलाते समय शान्त, हंसमुख, स्थिर, प्रेममय, सहानुभूति पूर्ण होना चाहिये क्योंकि जो गुण उसके पास इस समय होंगे, वे ही दूध तथा शारीरिक मानसिक सम्पर्क द्वारा उसमें विकसित हो जायेंगे। शिशु की मानसिक उन्नति, व्यक्तित्व के विकास तथा इन्द्रियजन्य सुख के लिए, शरीर की वृद्धि के लिये मां के स्तन से दुग्ध-पान कराना आवश्यक है।
(3) विश्राम सम्बन्धी आदतें — शिशु को अपने आप से सो जाने की आदत पड़ती चाहिए। आप उसका बिछौना बिछा सकते हैं। निश्चित समय पर बिछौने पर लिटा सकते हैं। प्रारम्भ में थपथपा भी सकते हैं लेकिन धीरे-धीरे इन उपकरणों का परित्याग कर दीजिए, लोरियां न गाइये वर्ना वैसी ही आदत पड़ जायगी। यदि बच्चा स्वयं सो जायगा तो धीरे-धीरे उसे स्वावलम्बन की आदत पड़ जायगी। स्वावलम्बन का विकास शैशव से ही करना चाहिये।
(4) आमोद प्रमोद के लिये रंग बिरंगे खिलौने, झुनझुने, आकर्षक वस्तुएं पास रखिए और बच्चे को खेल कर मनोरंजन करने दीजिये आप स्वयं भी उसके साथ खेल सकते हैं पर स्वावलम्बन न टूट जाय, यह ध्यान रखिये।
(5) स्नान तथा बच्चे की शारीरिक सफाई, मालिश, धूप स्नान इत्यादि नियमित रूप से किया करें। अंग्रेज बच्चों में स्वच्छता की स्वास्थ्य-प्रद आदतें आरम्भ में ही डाली जाती हैं। स्नान के पश्चात् तेल से बालों को स्निग्ध करना, पाउडर, क्रीम या हलका मक्खन मल देना, आंखों में काजल डालना, हलके हलके वस्त्र जो खूब ढीले-ढाले हों पहना दीजिए। बच्चे को खेलने दीजिये। दूर से देखते रहिये कि वे कैसे कार्य करता है। उसके स्वावलम्बन में अनुचित प्रेम द्वारा कोई बाधा न पहुंचाइये। जब तक आपको यह ज्ञात न हो जाय कि कोई आदत बच्चे पर कितनी अनुकूल बैठी है, तब तक उस पर नियमित रूप से बच्चे को चलाने का आग्रह न करें।
(6) भय से रोक थाम — यकायक बच्चे को गुदगुदाना, चौंका देना, नोंच लेना, गहराई से चूम लेना या काट लेना, अत्यधिक शोर या कोलाहल शिशु को स्तम्भित या हैरान करता है और भय, शंका तथा संकोच उत्पन्न करता है। इनसे बचे रहें।
(7) शिशु का प्रकृति या जगत की नाना वस्तुओं से धीरे-धीरे परिचय कराइये। कुत्ते, बिल्ली, बकरी का मेमना, गाय का बछड़ा इत्यादि से जो परिचय कराना हो तो वह इस प्रकार करावें कि वह भयभीत न हो जाय।
(8) चम्मच से या किसी दूसरी चीज को थाली से टकराकर ध्वनि द्वारा शिशु आनन्द लेता है, पालने से किसी खिलौने को बार-बार गिरा देता है, जिससे आप उठाकर दें, इन बातों से वह अपना आत्म-विश्वास बढ़ाता है। ज्यों-ज्यों बालक बढ़ता जाय, उसे अपने तरीके से स्वयं कार्य करने दीजिये परिस्थिति पर काबू पाने दीजिये। यदि परिस्थिति पर काबू पाने के लिये उसके हृदय में उत्साह रहेगा, तो उसके मन में हीनत्व या अपने आपको कमजोर न समझने का भाव उत्पन्न न होगा, स्वभाव में चिड़चिड़ापन या तुनुकमिजाजी भी न आवेगी। बालक को किसी ऐसे कार्य के सम्बन्ध में विवश या नियन्त्रित न कीजिए जिसका अन्तिम निर्णय करने का फैसला स्वयं उसी को करना आवश्यक हो। भोजन, दूध या जलपान, सोना या अन्य शारीरिक कार्यों को जहां तक सम्भव हो उसे स्वयं ही करने दीजिये। हर समय लाड़-प्यार मिजाजपुर्सी की आदत उसमें दूसरों पर निर्भर रहने की आदत डालती है।
संक्षेप में, जब शिशु बड़ा होकर स्वयं जीवन, जगत, वातावरण इत्यादि के नये अनुभव प्राप्त करने लगे तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। कुत्सित पापों से बचाकर निर्भयता, स्वावलम्बन, प्रसन्नता, दृढ़ता के भावों को जानना चाहिए। निप्पल चुसाना, सारे दिन बच्चे को गोद में लेना, अत्यधिक लाड़ प्यार, लोरियां गाना मानसिक दृष्टि से हानिकारक हैं, क्योंकि इनके उपयोग के कारण बच्चा वास्तविक संसार से दूर भागता है। उसे संसार की कठोरता का ज्ञान धीरे-धीरे स्वाभाविक रीति से कराना आवश्यक है। बच्चे को हमेशा अपने से धीरे-धीरे दूर होते जाने के लिए उत्साहित कीजिए और उसे अपना कार्य स्वयं करने के लिए प्रोत्साहन दीजिए।
यदि आप बालक का अपने साथ सम्बन्ध चिरस्थायी रखना चाहते हैं, तो वह परस्पर सेवा, सौहार्द, सहायता पर आश्रित होना चाहिए। यदि आपका बच्चा भूलों से स्वयं शिक्षा लेने लगेगा, तो स्वतन्त्र रूप से उसका व्यक्तित्व विकसित होने लगेगा।

