बच्चों की शिक्षा
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मन्द बुद्धि बालकों की समस्या सुलझाने के लिये तीन व्यक्तियों को विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है—माता-पिता एवं अध्यापक। इनमें से शिक्षक का उत्तरदायित्व महान् है। उसे देखना चाहिये कि मतिहीनता के क्या-क्या कारण हैं? क्या बच्चा जन्म से ही मूर्ख जन्मा है? क्या वह किसी वस्तु या विषय में रुचि प्रदर्शित करता है? उसे किस बात का विशेष रूप से शौक है? उसकी मतिहीनता का कारण कोई शारीरिक कमजोरी (बीमारी, चोट, गुप्त अंगों में विकार, दांतों का न निकलना, हकलाना, दुबलापन या मोटापन या अन्य इसी प्रकार के रोग) तो नहीं हैं? उसका वातावरण, जिसमें वह निवास करता है उत्साह, नव प्रेरणा, सहानुभूति से परिपूर्ण है या ताड़ना, मारपीट, पराधीनता से भरा है?
मन्दबुद्धि बालकों के लिए साधारण की अपेक्षा अधिक देखरेख, बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवहार तथा सहानुभूति पूर्ण वातावरण की अपेक्षा है। खेद का विषय है कि भौंदू अथवा मन्द बुद्धि बालकों पर कुछ व्यक्ति क्रोध, दुष्टता, शुष्कता, उत्तेजना, मारपीट का व्यवहार रखते हैं। बालक की छोटी अवस्था की यह उपेक्षा उसके भावी व्यक्तित्व पर विषम प्रभाव डालती है। वे यह विस्मृत कर बैठते हैं कि बालक की आवश्यकताएं उसकी पृथक् सत्ता रखती है और उनमें बालक की अन्तःचेतना एवं मनोबुद्धि अन्तर्निहित रहती है। बालक का जीवन, आचार-विचार, कल्पना एवं चिन्तन शक्ति एक अपनी निज की विशेषता लिये हुए होता है। जीवन के प्रति, जगत् के प्रति, प्रकृति के रहस्य लोक के प्रति उसकी बुद्धि सदैव सजग एवं क्रियाशील होती है जिन बातों को आप समझते हैं, क्या वह उनको देखता सुनता या ध्यान नहीं देता? उसका गुप्त मन चुपचाप व कुछ देखा और सुना करता है। बीते हुए जीवन की धुंधली स्मृतियां, वर्तमान के सुखद अथवा दुःखद क्षण, अभिलाषाएं दलित अनुभूतियां अन्तश्चेतना में संग्रहीत होती रहती हैं।
बच्चे का चतुर्दिक वातावरण उसके मानसिक पंगु या मन्दबुद्धि का प्रधान कारण होता है। प्रायः देखा गया है कि कुशल मनोवैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त अध्यापक अपने व्यवहार तथा वातावरण निर्माण द्वारा बच्चे की आन्तरिक जिज्ञासा को जागृत करने में समर्थ होते हैं।
श्री युधिष्ठर कुमार ने माता पिता का बच्चे को न समझना पर कुशल अध्यापकों के हाथ में आने पर उनमें आश्चर्यजनक परिवर्तनों के कुछ उपयोगी प्रयोगों का वर्णन इस प्रकार किया है—
मोहन बाल्यकाल से ही मन्दबुद्धि था। इस कारण वह साढ़े छह वर्ष की अवस्था में स्कूल में प्रविष्ट हुआ। उसकी माता उसकी अज्ञानता का कारण उसका रोग बताया करती थी। इसी कारण साढ़े छह वर्ष की अवस्था तक वह कुछ न सीख सका। जब उसे स्कूल में दाखिल कराया गया तो उसको दूसरे बच्चों की देखा देखी अनुकरण की प्रवृत्ति उत्तेजित हो उठी। उसके हृदय में भी पढ़ने-लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई। एक मास तक उसके अध्यापक ने उस पर परिश्रम किया। फलतः उसकी मन्दबुद्धि दूर हो गई। स्कूल वालों ने मोहन को कभी मन्दबुद्धि नहीं माना, उसके साथ प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया गया, उसकी उत्सुकता को प्रेम से शान्त किया गया और निरन्तर उसे उत्साहित किया जाता रहा। उसको स्कूल का अच्छा वातावरण प्राप्त होने से उसकी बुद्धि ठीक हो गई। यह सब मौंटेसरी शिक्षा का प्रभाव था।
दूसरा उदाहरण अजीत का है। आठ वर्ष की आयु तक वह कोई अक्षर ज्ञान न प्राप्त कर सका उसके माता पिता ने उसे मन्दबुद्धि समझकर एक मौंटेसरी स्कूल में प्रविष्ट कराया। माता पिता का कथन है कि अजीत की सदैव यही इच्छा रहती थी कि वह खेलता रहे। नये स्कूल में उसे नये मित्र प्राप्त हुए, नया वातावरण मिला, उसे नये-नये खिलौने और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार मिला फलतः बच्चा चल निकला। उसके अध्यापकों ने बच्चे का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया और उसकी उत्कंठा को जाग्रत करते रहे।

