मानसिक परीक्षा कराइये
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माता-पिता तथा अध्यापक का प्रथम कर्तव्य बच्चे के मानसिक तत्वों की परीक्षा है। उनकी भूल यह है कि वे सबको एक ही प्रकार की शिक्षा प्रदान कराना चाहते हैं। कुछ बच्चे पुरानी लकीरों या पद्धति पर नहीं चलते तो उन्हें मन्दबुद्धि कह कर टाल दिया जाता है।
प्रत्येक बच्चे की प्रकृति, मानसिक, शारीरिक तथा बौद्धिक गुण पृथक-पृथक हैं। उन्हें समझने में गलती की जाती है। कुछ व्यक्ति अपनी मानसिक शक्तियों का विकास अपेक्षाकृत विलम्ब से करते हैं। डार्विन जैसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक से कौन अपरिचित है? उसकी मूर्खताओं से उसके माता-पिता तथा अध्यापक तंग आगये थे। कुत्ते, बिल्ली, पक्षी, उनके पंख, घोंसले एकत्रित करने के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं भाता था। स्कूल में जब दूसरे विद्यार्थी अध्ययन किया करते थे, वह चुपचाप कक्षा से खिसक जाता तथा जंगल में पक्षियों के घोंसले एकत्रित करने में समय व्यतीत करता था। समस्त परिवार तथा स्कूल के लिए उपहास का चिह्न यही डार्विन स्कूल से निकाल दिया गया। बड़े होने पर यकायक उसकी बुद्धि का स्रोत खुल गया और वह महान् व्यक्ति बना। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कब किसी बच्चे का बुद्धि विकास यकायक प्रारम्भ हो जायगा? शिक्षण तथा बुद्धि विकास के प्रयत्न निरन्तर जारी रखने में ही बुद्धिमानी है, क्योंकि थोड़ा ही सही, शिक्षण का कुछ न कुछ अलक्षित प्रभाव अवश्य पड़ता रहता है।

