चोरी करने वाले बच्चे
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कुछ बालकों में चोरी की ग्रन्थि होती है। बाल्यावस्था में बालकों से छिपाकर रखने की मां-बाप की आदत, धीरे-धीरे उसमें भी आ जाती है। जिन बालकों को बाल्यावस्था में खाने खेलने या ओढ़ने पहनने के लिए पर्याप्त साधन प्राप्त नहीं होते उनकी ये इच्छाएं आन्तरिक मन में दलित अनुभूतियों के रूप में रहती हैं। वे फौरन चीजों को अनुचित साधनों से प्राप्त करना चाहते हैं। यह आदत चोरी बन जाती है।
श्री दौलतचन्द्र का विचार है, ‘‘जबसे बालक को यह ज्ञान होने लगता है कि अमुक वस्तु उसकी है, तभी से वह यह भी जानने लगता है कि अमुक वस्तु उसकी नहीं अथवा यह कि वह किसी दूसरे की है और इसको उसे नहीं लेना चाहिए। जो बालक बाद में चोरी करते हैं उनकी वस्तुएं पहले, जब वे शायद छोटे हों, बड़ों द्वारा जाने अथवा अनजाने में अनधिकार रूप से भी ली गई होती है। चोरी की आदत परिवार की आर्थिक कठिनाइयों व अभाव की स्थिति के कारण भी पड़ जाती है।’’
उपरोक्त कारणों में पर्याप्त तथ्य है। जिस बालक का विकास तंगी, अभाव, कमी या गरीबी में होता है, जो बालक दूसरों को अपने से अच्छा रहते हुए अच्छे वस्त्र पहनते हुए देखता है, वह अन्दर ही अन्दर उन चीजों को प्राप्त करने के लिए लालायित होता है। उसमें एक प्रकार की ईर्ष्या का भाव विकसित होता रहता है, जो चोरी की आदत में प्रकट होता है।
इस रोग को दूर करने के लिये ऐसा वातावरण उपस्थित करना चाहिये जिससे उसे दैनिक जीवन की आवश्यकताएं पूर्ण करने के समस्त साधन अनायास ही उपलब्ध होते रहें, वह जिन चीजों की कामना करता है, उसे स्वयं सबके सामने दे दीजिये। कुछ जेब खर्च भी दीजिये प्रेम से समझाइये और यथासम्भव अतृप्त न होने दीजिये

