रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहित कीजिये
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रचनात्मक कार्य क्या-क्या हैं? बच्चों से ऐसे घर तथा बाहर के कार्य कराइये, जिनमें वे दिलचस्पी लेते हैं। उदाहरणार्थ पुस्तकों को ढंग से रखना, कमरे की सफाई, मेकानों से खिलौने बनाना, पुल तथा अन्य वस्तुएं बनाना, कागज को फूलों के रूप में काटना, मिट्टी के खिलौने, चित्रों में रंग भरना, बागवानी करना, तरह-तरह के फूल बेलें लगाना, क्यारियां बनाना, छोटे-छोटे जानवर जैसे कबूतर, तोता, हरिण, कुत्ता, बिल्ली, खरगोश इत्यादि पालना तथा उनकी देखभाल, भोजन की छोटी-मोटी चीजें जैसे कच्चे सलाद बनाना, लड़कियों से सीने पिरोने, काढ़ने, क्रोशिया से बुनने, कपड़ा काटने गुड़िया बनाने, श्रृंगार करने नृत्य संगीत इत्यादि कराना उपकारी है। बच्चे चित्रकारी में विशेष दिलचस्पी रखते हैं बालक की शिक्षा उसके वातावरण को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए। जिस व्यवसाय में बालक को लगाना है, उसी के अनुरूप शुरू से ही उसे चलाना चाहिए। हाथ से काम करने की शिक्षा देने का यही उपयुक्त समय है। उन्हें श्रमजीवी बनाने की चेष्टा करनी चाहिए।
प्रायः यह शिकायत की जाती है कि बालकों में निरन्तर अनुशासन की कमी होती जा रही है। इसका कारण यह नहीं है कि हम प्रारम्भ से ही बच्चों को उचित रीति से अनुशासन में नहीं लेते हैं। प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री श्री लालजीराम लिखते हैं—
‘‘बालकों की उचित शिक्षा के लिये उनके हृदय पर काबू रखना आवश्यक है। पढ़ाई की उचित रीति तथा अनुशासन की अनेक सहायताएं बालकों में शिक्षक के प्रति श्रद्धा होने पर अपने आप हल हो जाती है। यदि शिक्षक प्रत्येक बालक के जीवन से परिचय रखता है, यदि वह प्रत्येक बालक से अलग-अलग समय निकाल कर मिलता रहता है, तो उसे पढ़ाई में कोई भी कठिनाई न होगी और न अनुशासन भंग होने की समस्या सामने आवेगी। जब बालक और शिक्षक के मध्य हृदय की एकता रहती है, तो जो बात शिक्षक कहता है वह उसे ध्यान से सुनता है और उसका ध्यान पढ़ाई में लगा रहता है। वह पढ़ाई के कार्य में आनंद की अनुभूति करता है। अनुशासन की समस्या उसके सामने नहीं आती। उद्दण्ड बालक भी शिष्ट बन जाते हैं। प्रेम सभी प्रकार के रोगों का निवारण करने की रामबाण दवा है। यदि शिक्षक और बालक के बीच प्रेम है, तो उद्दण्डता को कोई स्थान नहीं मिलता।’’
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