भावुकता जन्य ग्रंथियां—
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अति भावुकता का भयंकर प्रभाव होता है। ग्रहणशील बच्चा अंदर ही अंदर मानसिक पीड़ा से घुलता रहता है, क्षुद्र सी बात को अपनी कल्पना से बढ़ा-चढ़ा कर देखता है, कुछ बच्चे घर छोड़ कर भागने का प्रयत्न करते हैं, कोई-कोई आत्महत्या जैसे गर्हित अपराध कर बैठते हैं। कभी-कभी चौदह पन्द्रह वर्ष के नवयुवक कामवासना के भड़कने से गन्दे मार्गों पर पड़ जाते हैं और हस्त मैथुन, गुदा मैथुन तथा अन्य कुत्सित आदतों के शिकार होते हैं। बाद में जब उन्हें अपनी कमजोरी का ज्ञान होता है तो पश्चाताप, आत्मग्लानि और नैराश्य में इतने डूब जाते हैं कि उनका जीवन एक लम्बी उदासी से परिपूर्ण हो जाता है। उनका किसी कार्य में जी नहीं लगता, दिन भर खोये-खोये से रहते हैं, समस्त उच्च आशाएं नष्ट हो जाती हैं। इनका कारण अधिक भावुकता ही है।
अधिक उदास, आत्मग्लानि से परिपूर्ण, दुःखी, अपने को अपराधी समझने वाला बच्चा विकसित होकर फूहड़ और मंद बुद्धि हो जाता है, उसकी प्रतिभा दब जाती है, आत्म विश्वास लुप्त हो जाता है, वह अपनी भावुकता को आलस्य से ढकने का प्रयत्न करता है। उसकी महत्वाकांक्षा नष्ट हो जाती है।
आपको चाहिये कि ऐसे बच्चों के विलुप्त आत्म विश्वास को पुनः स्थापित करें, यदि उनका आत्म विश्वास सो गया है तो उसे पुनः जाग्रत करने का प्रयत्न करें। पठन पाठन के लिए स्कूल जाने से पूर्व उसका आत्मविश्वास खूब उत्तेजित करें अन्यथा अपने सहपाठियों के मध्य वह शर्मिंदा रह कर आत्महीनता की ग्रंथि (अपने को छोटा समझने की आदत) का विकास कर लेगा। श्री दर्शन का कथन है, ‘‘शर्मीले भावुक बालक जब तक घर से ही तैयार करके न भेजे जांय, स्कूल के जीवन से बहुत घबराते हैं, क्योंकि उन पर स्कूल में की गई छोटी से छोटी नुक्ताचीनी भी उनके हृदय पर गहरा आघात करती है। बालक में आत्मविश्वास को उसी सीमा तक प्रोत्साहित करना चाहिए जहां तक कि वह उसकी अस्वाभाविक भावुकता को दूर करने में सहायता दे। ऐसा न हो कि उसकी मात्रा बालक में इतनी बढ़ जाय कि उसे शेखीखोरा बनादे।’’
आपको मध्य का मार्ग ही ग्रहण करना उचित है। न तो इतना अधिक प्रोत्साहन ही दीजिये कि बालक अनावश्यक रूप से उच्छृंखल बन जाय, न उसे इतना डांटिये फटकारिये ही कि वह अपने सहपाठियों के मध्य भी आत्महीनता का भाव अनुभव करे। स्मरण रखिये बालक के जिस प्रकार के मानसिक संवेद का दमन बाल्यकाल में होता है बालक की मानसिक ग्रंथि उसी प्रकार की होती है। भय, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, लज्जा, आत्मग्लानि इत्यादि सभी मनोविकार पृथक-पृथक अनेक जटिल मानसिक ग्रन्थियों की रचना करते हैं। शैशवावस्था के ये भय, लज्जा या आत्मग्लानि के संस्कार युवा तथा प्रौढ़ावस्था में विचलित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार की जटिल मानसिक बीमारियों के कारण बन जाते हैं। फ्रायड के अनुसार प्रथम पांच वर्ष की अवस्था के जीवन की नाना हर्ष विषादमय घटनाएं बालक का मानसिक संस्थान बनाती या बिगाड़ती हैं। जो बालक शैशव में किसी वस्तु से भयभीत, शंकित, लज्जित या आत्मग्लानि से परिपूर्ण हो गया है उसका मानसिक विकास विचित्र प्रकार का होता है।

