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Books - मनचाही सन्तान

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डरने वाले बच्चे

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बालकों की मानसिक बीमारियों में भय की भावना ग्रंथि बड़ी विकट है। इसके फलस्वरूप बच्चे में कुछ रोगों की उत्पत्ति होती है जैसे भयानक स्वप्न देखना, अकेले रहने से डरना तथा सबसे चिढ़ना इत्यादि। भयानक स्वप्न देखने वाले बालकों को निर्भयता के वातावरण में रखना चाहिए। अवकाश के समय निर्भयता की पुष्टि करने वाली कहानियां, वीर पुरुषों की गाथाएं, ऐसे ही पवित्र चित्र दिखाने चाहिए, जिससे बालक के अंतर्मन से भय की ग्रन्थि टूट जाय। सोने से पूर्व उसे निर्भयता के संकेत दिये जाने चाहिये—

‘‘तुम वीर हो। तुम सब जगह विजयी होते हो। तुम्हें कोई हरा नहीं सकता। तुम बहादुर बच्चे हो। कौन तुम्हें हरा सकता है। तुम बड़े होकर महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, जैसे पुरुष बनोगे।’’ इस प्रकार के संकेतों को पुनः-पुनः दुहराने से बच्चे में खोया हुआ आत्म विश्वास जागृत हो जाता है। वीर भाव की वृद्धि करने वाले गीत गाकर सुनाना भी गुणकारी है।

अकेले में डरने वाले बालकों को प्रेम की अतृप्त इच्छा रहती है। जब बालक प्रेम का पूरा अंश प्राप्त कर लेता है, तो उसकी यह आदत स्वयं छूट जाती है। ज्यों-ज्यों बच्चे का आत्म विश्वास दृढ़तर होता जायगा, त्यों-त्यों इस ग्रंथि‍ का दूषित प्रभाव कम होता जायगा। धीरे-धीरे उसके अवचेतन में स्वाभाविक निर्भय भावना आ जायगी। यदि अवचेतन के भय का, चेतन निर्भयता से सामंजस्य स्थापित कर दिया जाय, तो भय की ग्रन्थि का निराकरण स्वयं हो जाता है।

अन्धकार के डर को निकालने के लिए भी मन से अंधेरे के प्रति भय के भाव को निकालना चाहिये। गर्भवती स्त्री जब अन्धेरे में जाने से डरती है तो उसका बच्चा भी डरने लगता है। अतः पति को सदैव पत्नी को वीरतापूर्ण कहानियां ही सुनानी चाहिए। बच्चों को धीरे-धीरे, स्वयं उनके साथ अन्धेरे में रहकर, यह रोग दूर करना चाहिये।

‘‘स्वप्न में उठ कर घूमना’’ इस बीमारी का करण माता पिता के मध्य प्रेम न्यूनता है। घूमने कारण अतृप्ति है। बालक वातावरण से अतृप्त है। यह अतृप्ति उसके गुप्त मन में प्रविष्ट हो चुकी है। अतएव उस प्रेमपूर्ण व्यवहार हंसी खुशी के वातावरण में रखकर निकालना चाहिए। आपके सद्भाव पूर्ण व्यवहार तथा सहानुभूति से आन्तरिक संघर्ष की गुत्थियां सुलझ कर बच्चा गहरी निद्रा में से सकेगा।

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मनचाही सन्तान
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